भारतीय संविधान में व्यवस्था “क्वाज़ी–फेडरल” कही जाती है, जिसमें संघीय और एकात्मक दोनों विशेषताएँ हैं। संविधान का लक्ष्य राज्यों की स्वायत्तता और मज़बूत केंद्र के बीच संतुलन बनाना है, लेकिन अनेक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कारण इस संतुलन को लगातार चुनौती देते हैं।
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* अनुच्छेद 1: “इंडिया, दैट इज़ भारत, यूनियन ऑफ स्टेट्स” – राज्यों की संधि से नहीं, एकात्मक से संघीय रूपांतरण
* मूल द्वंद्व: राज्यों की स्वायत्तता बनाम मज़बूत केंद्र (एकता, अखंडता के लिए)
* क्षेत्रवाद व नए राज्यों की माँग (तेलंगाना, गोरखालैंड, विदर्भ आदि) संघीय ढाँचे पर दबाव
* सत्ता का केंद्रीकरण – यूनियन/समवर्ती सूची, अवशिष्ट शक्तियाँ, अनुच्छेद 200, 249, 352, 356, 360, 256–257
* राजकोषीय संघवाद कमजोर; बड़े कर केंद्र के पास, राज्यों की आयोग व अनुदान पर निर्भरता
* राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व; संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया में राज्यों की सीमित भूमिका
* अविनाशी संघ, विनाशी इकाइयाँ – संसद राज्यों की सीमाएँ बदल सकती है, सहमति हमेशा बाध्यकारी नहीं
* राज्यपाल का पद व अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग – अक्सर केंद्र के राजनीतिक औज़ार के रूप में आलोचना
* एक ही संविधान, एक ही नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, अखिल भारतीय सेवाएँ संघीयता पर एकात्मक झुकाव
* केंद्रीकृत योजना, आर्थिक असमानता, भाषा विवाद, धार्मिक–बाहरी दबाव (विशेषकर उत्तर–पूर्व) संघीय ताने-बाने को कमजोर करते हैं





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