भारत में अदालतों में मामलों की भारी लंबितता के कारण मध्यस्थता (Arbitration) की महत्ता बढ़ रही है। विवादों के शीघ्र और निष्पक्ष निपटान के लिए 1996 का मध्यस्थता और सुलह अधिनियम (Arbitration and Conciliation Act) कानूनी आधार प्रदान करता है।
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- मध्यस्थता में तीसरा निष्पक्ष पक्ष विवाद का समाधान करता है।
- अदालत से बाहर निपटान का विकल्प, न्यायालयों का बोझ घटाता है।
- विवाद निपटान की लागत और अदालत हस्तक्षेप दोनों कम करता है।
- समयबद्ध प्रक्रिया से त्वरित निर्णय सुनिश्चित करता है।
- निष्पक्षता और निर्णय के पालन की गारंटी देता है।
- निवेशकों का भरोसा बढ़ाता है, स्थिर कानूनी ढांचा बनाता है।
- घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों प्रकार के विवादों पर लागू।
- 1996 के मध्यस्थता और सुलह अधिनियम के तहत संचालित।
- 1985 के UNCITRAL मॉडल कानून और 1976 नियमों पर आधारित।
- भारत को निवेश और व्यापार के अनुकूल देश के रूप में प्रस्तुत करता है।





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