ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन अधिनियम, 2026 ने भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों से जुड़े कानून में बड़े बदलाव किए हैं, जिनमें पहचान प्रमाणन की नई प्रक्रिया और कानूनी परिभाषाओं में संशोधन शामिल हैं। इसके बाद यह कानून सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती का विषय बन गया है।
BulletsIn
- ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक, 2026 को 13 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया और 30 मार्च 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बना।
- यह संशोधन ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अधिनियम, 2019 में बदलाव करता है और भारत में जेंडर पहचान की कानूनी प्रक्रिया को परिवर्तित करता है।
- नए कानून में स्व-पहचानी गई जेंडर पहचान के आधार पर पहचान प्रमाणपत्र प्राप्त करने का प्रावधान समाप्त कर दिया गया है।
- संशोधित अधिनियम के तहत अब पहचान प्रमाणपत्र जारी करने के लिए निर्धारित मेडिकल बोर्ड की जांच और जिला मजिस्ट्रेट की मंजूरी आवश्यक होगी।
- इस अधिनियम में ट्रांसजेंडर की कानूनी परिभाषा को सीमित किया गया है और 2019 के कानून में शामिल ट्रांस-मेन, ट्रांस-वूमेन और जेंडरक्वियर व्यक्तियों को बाहर रखा गया है।
- संशोधन में किसी व्यक्ति को जबरन ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए अपहरण या गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचाने जैसे अपराधों पर आजीवन कारावास तक की सख्त सजा का प्रावधान किया गया है।
- राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत इस कानून को मंजूरी दी।
- सुप्रीम कोर्ट ने 4 मई 2026 को इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर केंद्र सरकार और राज्यों को नोटिस जारी किए।





What do you think?
It is nice to know your opinion. Leave a comment.