ब्रिटिश शासन में भूमि राजस्व नीतियों ने कृषि व्यवस्था को बदल दिया जमींदारी रैयतवारी और महालवारी प्रणालियों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा
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• ब्रिटिश शासन ने अधिक राजस्व प्राप्त करने और प्रशासनिक नियंत्रण के लिए जमींदारी रैयतवारी और महालवारी जैसी तीन प्रमुख भूमि राजस्व प्रणालियां लागू की
• 1793 की स्थायी व्यवस्था में जमींदारों को भूमि का स्वामी बनाया गया जबकि किसान किरायेदार बन गए और उन पर अधिक कर का बोझ बढ़ गया
• रैयतवारी व्यवस्था में सरकार ने सीधे किसानों से कर वसूला जिससे उन्हें स्वामित्व मिला लेकिन अत्यधिक कर के कारण वे कर्ज और गरीबी में फंस गए
• महालवारी व्यवस्था में पूरे गांव या महाल से कर वसूला जाता था और समय समय पर कर में वृद्धि से किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ता गया
• अधिक कर के कारण किसानों ने कपास गन्ना और जूट जैसी नकदी फसलों की खेती शुरू की जिससे कृषि का व्यावसायीकरण बढ़ा
• इन नीतियों से अनुपस्थित जमींदारी और मध्यस्थों की संख्या बढ़ी जिससे सामाजिक असमानता और ग्रामीण ढांचे में बदलाव आया
• भारी कर व्यवस्था के कारण किसान कर्ज में डूब गए अकाल और विद्रोह बढ़े जिससे ग्रामीण जीवन में व्यापक संकट उत्पन्न हुआ
• कुल मिलाकर ब्रिटिश नीतियां कृषि विकास के बजाय राजस्व बढ़ाने पर केंद्रित रहीं जिससे उत्पादकता में गिरावट और दीर्घकालिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हुई





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