भारत की न्यायपालिका गंभीर पेंडेंसी संकट का सामना कर रही है। निचली अदालतों में 4.80 करोड़ से अधिक और सुप्रीम कोर्ट में लगभग 91,000 केस लंबित हैं। भारी रिक्तियों, कमजोर बुनियादी ढांचे और धीमी नियुक्ति प्रक्रिया ने स्थिति को और गंभीर बनाया है, जिससे त्वरित सुधारों की मांग तेज हो गई है।
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- निचली अदालतों में 4.80 करोड़ केस लंबित; सुप्रीम कोर्ट में pendency 30% बढ़ी (2021–2025).
- इलाहाबाद हाईकोर्ट में सबसे अधिक लंबित केस: 11.66 लाख; यूपी में देश का 23% backlog.
- जज–जनसंख्या अनुपात सिर्फ 21/मिलियन, जबकि सिफारिश 50/मिलियन.
- रिक्तियां: निचली अदालतों में 4,855 और हाईकोर्ट्स में 297 पद खाली.
- कोर्टरूम, स्टाफ, stenographers, तकनीकी सुविधाओं की कमी से प्रतिदिन की सुनवाई प्रभावित.
- बार-बार adjournments और कमजोर case-management से वर्षों तक केस लटकते.
- Collegium–Executive विवाद और धीमी भर्ती प्रक्रिया pendency बढ़ाती है.
- ADR का सीमित उपयोग; लोक अदालतें मुख्यतः छोटे मामलों तक सीमित.
- पेंडेंसी Article 21 के speedy trial अधिकार को कमजोर करती; न्याय में देरी = न्याय से इंकार.
- आर्थिक नुकसान: commercial मामलों की देरी से निवेशकों का भरोसा घटता.
- सुधार आवश्यक: तेज भर्ती, डिजिटल कोर्ट, सख्त adjournment नियम, ADR को बढ़ावा, विशेष अदालतें.





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