भारतीय अदालतों में लगभग आधे मुकदमे सरकार से जुड़े होते हैं। इसके बावजूद, सरकारी मुकदमों के सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। यह समस्या दशकों से न्यायिक ढांचे पर बोझ डाल रही है और जनता के धन की बर्बादी का कारण बनी हुई है। 2010 में राष्ट्रीय वाद नीति (NLP) शुरू की गई, लेकिन अस्पष्ट प्रावधानों और जवाबदेही की कमी से यह विफल रही।
मुख्य बिंदु (हिंदी):
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- कुल लंबित मामलों में लगभग 50% में सरकार पक्षकार, जिससे न्यायिक बोझ बढ़ा।
- सरकारी मुकदमों के सही आंकड़े नहीं; समस्या पर निगरानी की कमी दिखती है।
- 1970 के दशक से सुप्रीम कोर्ट सरकार को लापरवाह मुकदमेबाजी पर फटकारता रहा।
- विधि आयोग की 126वीं रिपोर्ट (1988) ने समस्या बताई, सुधार नहीं हुआ।
- 90% से अधिक मामलों में सरकार अपना पक्ष साबित करने में असफल।
- कई मामले विभाग बनाम विभाग, निर्णय अदालत पर छोड़ा जाता है।
- NLP 2010 “जिम्मेदार सरकार” हेतु बनाई गई, पर अस्पष्ट और अमल-अयोग्य रही।
- नीति में जवाबदेही, कार्यवाही और समितियों की भूमिका स्पष्ट नहीं।
- प्रभाव मूल्यांकन नहीं हुआ; नीति सिर्फ सैद्धांतिक दस्तावेज बनी रही।
- 2015 से नई नीति पर चर्चा जारी; स्पष्ट लक्ष्य, जवाबदेही और मूल्यांकन की जरूरत।





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