विरोध प्रदर्शन का अधिकार भारतीय लोकतंत्र का एक मूल आधार है, जो नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने, असहमति व्यक्त करने तथा शासन को जवाबदेह बनाने का अवसर प्रदान करता है। यह अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित है, किन्तु सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में इस पर युक्तिसंगत प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।
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- भारत में विरोध प्रदर्शन का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 से प्राप्त होता है। अनुच्छेद 19(1)(क) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्ण और निःशस्त्र सभा करने का अधिकार प्रदान करता है।
- स्वतंत्रता संग्राम से लेकर वर्तमान समय तक शांतिपूर्ण जन आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं, जिनके द्वारा नागरिक सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय तथा राजनीतिक विषयों पर अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं।
- अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के अंतर्गत राज्य भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, मानहानि तथा अपराध के लिए उकसावे की रोकथाम जैसे आधारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकता है।
- सार्वजनिक प्रदर्शनों के संचालन के लिए प्रशासन पूर्व अनुमति, निर्धारित प्रदर्शन स्थल, यातायात प्रबंधन, सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश तथा आवश्यकता पड़ने पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के अंतर्गत प्रतिबंधात्मक आदेश लागू कर सकता है।
- हिमत लाल के. शाह बनाम पुलिस आयुक्त (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि शांतिपूर्ण सभा का अधिकार लोकतंत्र का मूल तत्व है तथा प्रशासन इसका विनियमन कर सकता है, लेकिन मनमाने अथवा पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा सकता।
- मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) में सर्वोच्च न्यायालय ने जंतर मंतर को प्रदर्शन के मान्यता प्राप्त स्थल के रूप में स्वीकार करते हुए कहा कि उचित विनियमन संभव है, किन्तु शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पर पूर्ण रोक नहीं लगाई जा सकती।
- अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020), जिसे शाहीन बाग प्रकरण के नाम से जाना जाता है, में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार सार्वजनिक मार्गों को अनिश्चितकाल तक अवरुद्ध करने अथवा अन्य नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं देता।
- भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भी शांतिपूर्ण सभा को लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग बताया है तथा नागरिक स्वतंत्रताओं, सार्वजनिक सुरक्षा, विधि के शासन और आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया है।





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