सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को नई दिल्ली में फैसला दिया कि अदालतें अनुच्छेद 200 और 201 के तहत गवर्नर या राष्ट्रपति पर बिलों की मंजूरी के लिए कोई तय समयसीमा लागू नहीं कर सकतीं। यह निर्णय अनुच्छेद 143 के तहत भेजे गए संदर्भ पर आया।
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- कोर्ट ने बिल मंजूरी पर तय समयसीमा लगाने से इंकार किया।
- संविधान में गवर्नर-राष्ट्रपति के लिए कोई निश्चित समय नहीं।
- तय समय जोड़ना संविधान में बदलाव जैसा, कोर्ट ने कहा।
- “जितना शीघ्र संभव हो” का मतलब urgency, पर दिन तय नहीं।
- अनिश्चितकाल तक assent रोकना असंवैधानिक और समीक्षा योग्य।
- अनुचित देरी पर न्यायिक समीक्षा संभव।
- अप्रैल 2025 के समयसीमा वाले फैसले का प्रभाव समाप्त।
- फैसला संघीय ढांचे और संवैधानिक संतुलन को मजबूत करता है।
- विधानमंडलों को उचित समय में कार्रवाई का आश्वासन।
- जवाबदेही बनी रहेगी, पर बिना कठोर समयसीमा के।





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