मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया बदलकर स्वतंत्रता मजबूत की, कार्यपालिका प्रभुत्व कम किया और लोकतांत्रिक चुनावों की विश्वसनीयता सुनिश्चित की।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त राष्ट्रपति की नियुक्ति समिति की सिफारिश पर होंगे।
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समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष नेता और मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे, जिससे नियुक्तियाँ निष्पक्ष और पारदर्शी होंगी।
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यह निर्णय 2015 की जनहित याचिका पर आधारित था, जिसमें अपारदर्शी नियुक्तियाँ और राजनीतिक पक्षपात से आयोग की स्वतंत्रता खतरे में बताई गई थी।
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न्यायालय ने अनुच्छेद 324 के तहत संसद की निष्क्रियता को संवैधानिक शून्यता बताया और न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक माना।
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अस्थायी नियुक्ति प्रक्रिया केवल तब तक लागू रहेगी जब तक संसद चुनाव आयोग नियुक्तियों पर व्यापक कानून नहीं बनाती।
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फैसले ने यह सुनिश्चित किया कि आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता का धारणा और वास्तविकता दोनों बनाए रखी जाए।
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निर्णय चुनाव आयोग की स्वायत्तता मजबूत करता है, कार्यपालिका हस्तक्षेप कम करता है और लोकतंत्र में संस्थागत सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय न्यायिक निगरानी और विधायी अधिकारों का संतुलन रखते हुए भविष्य में आयोग की निष्पक्षता सुनिश्चित करेगा।





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