28 जनवरी 1950 को स्थापित भारत का सर्वोच्च न्यायालय अपने 75 वर्षों की यात्रा पूरी कर चुका है। 2024 के आयोजनों में नया ध्वज-चिह्न, स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी किए गए। न्यायालय ने अपनी ऐतिहासिक और निर्णायक भूमिकाओं के माध्यम से भारत की संवैधानिक व्यवस्था और न्यायिक दर्शन को गहराई से आकार दिया है।
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- 75 वर्ष पूरे; राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री द्वारा नया ध्वज, प्रतीक, डाक-टिकट, सिक्का जारी।
- स्थापना पूर्व—फेडरल कोर्ट (1937–1950); प्रिवी काउंसिल की जगह लिया।
- पहली बैठक संसद भवन के प्रिंसेज़ चैंबर में; 1958 में तिलक मार्ग परिसर में स्थानांतरित।
- जजों की संख्या 1950 में 8 से बढ़कर 2019 में 34।
- ऐतिहासिक फैसले: केशवानंद भारती (बेसिक स्ट्रक्चर), एस.आर. बोम्मई (धारा 356 सीमाएं), विशाखा (महिला सुरक्षा), पुट्टस्वामी (निजता अधिकार)।
- जनहित याचिका (PIL) की शुरुआत—न्याय तक व्यापक पहुंच का मार्ग खुला।
- संविधान के अनुच्छेद 124–147 न्यायालय की संरचना, शक्तियां, नियुक्ति, प्रक्रिया निर्धारित करते हैं।
- स्वतंत्रता सुनिश्चित: जज हटाना केवल महाभियोग से; सेवानिवृत्ति के बाद प्रैक्टिस नहीं; वेतन समेकित निधि से।
- नई खुली-आंखों वाली जस्टिटिया प्रतिमा—न्याय की सजगता, समानता और भारतीय सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक।
- चुनौतियाँ: लंबित मामलों का बोझ, कोलेजियम पारदर्शिता विवाद, न्यायिक अतिउत्साह की आलोचना।
- डिजिटल न्याय सुधार जारी: ई-कोर्ट, वर्चुअल सुनवाई से न्याय सुलभता बढ़ी।





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