शक्तियों का पृथक्करण भारतीय संविधान का एक मूल सिद्धांत है, जिसके तहत शासन की शक्तियाँ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभाजित की गई हैं, ताकि लोकतंत्र में शक्ति का दुरुपयोग न हो।
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शक्तियों का पृथक्करण शासन को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभाजित करता है।
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अवधारणा मोंतेस्क्यू के सिद्धांत से प्रेरित, शक्ति के केंद्रीकरण को रोकने हेतु।
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भारत में कठोर नहीं, बल्कि कार्यात्मक पृथक्करण की व्यवस्था अपनाई गई है।
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विधायिका कानून बनाती है, बजट पारित करती है, कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है।
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कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है और प्रशासन व नीतियों का संचालन करती है।
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न्यायपालिका कानूनों की व्याख्या, मौलिक अधिकारों की रक्षा और न्यायिक समीक्षा करती है।
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अनुच्छेद 50 न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने का निर्देश देता है।
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जांच और संतुलन प्रणाली तीनों अंगों के बीच सहयोग और जवाबदेही सुनिश्चित करती है।





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