भारत के राष्ट्रपति को संविधान के तहत वीटो शक्ति प्राप्त है, जिसके माध्यम से वे संसद द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी दे सकते हैं, अस्वीकार कर सकते हैं या पुनर्विचार हेतु लौटा सकते हैं।
BulletsIn
- वीटो शक्ति राष्ट्रपति को किसी विधेयक को मंजूरी देने, अस्वीकार करने या रोकने का अधिकार देती है।
- यह शक्ति मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 111 में दी गई है।
- अनुच्छेद 201 राज्यों के कुछ विधेयकों पर राष्ट्रपति की शक्ति से संबंधित है।
- वीटो शक्ति असंवैधानिक या त्रुटिपूर्ण कानूनों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती है।
- यह विधायिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।
- राष्ट्रपति को Absolute Veto, Suspensive Veto और Pocket Veto प्राप्त हैं।
- Absolute Veto में राष्ट्रपति किसी विधेयक को पूरी तरह अस्वीकार कर सकते हैं।
- ऐसी स्थिति में विधेयक कानून नहीं बन पाता।
- यह शक्ति मुख्यतः निजी सदस्य विधेयकों या विशेष परिस्थितियों में प्रयोग की जाती है।
- Suspensive Veto के तहत राष्ट्रपति विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं।
- दोबारा पारित होने पर राष्ट्रपति को मंजूरी देना अनिवार्य होता है।
- मनी बिल पर Suspensive Veto लागू नहीं होता।
- Pocket Veto में राष्ट्रपति विधेयक पर अनिश्चित समय तक कोई निर्णय नहीं लेते।
- संविधान में राष्ट्रपति के निर्णय के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है।
- पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने 1986 में Pocket Veto का प्रयोग किया था।
- भारत के राष्ट्रपति के पास अमेरिकी राष्ट्रपति जैसी Qualified Veto शक्ति नहीं है।
- संवैधानिक संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति वीटो का प्रयोग नहीं कर सकते।
- 24वें संविधान संशोधन के बाद ऐसे विधेयकों पर मंजूरी देना अनिवार्य है।
- राज्यपाल द्वारा आरक्षित कुछ राज्य विधेयकों पर भी राष्ट्रपति वीटो शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं।
- वीटो शक्ति संवैधानिक मूल्यों और विधायी समीक्षा को मजबूत बनाती है।





What do you think?
It is nice to know your opinion. Leave a comment.