भारत के प्रथम लोकसभा अध्यक्ष जी. वी. मावलंकर ने 1954 में पद से हटाने के प्रस्ताव का सामना किया और सदन के निर्णय से अपना पद सुरक्षित रखते हुए संसदीय परंपरा स्थापित की।
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- जी. वी. मावलंकर 1954 में पद से हटाने के प्रस्ताव का सामना करने वाले प्रथम लोकसभा अध्यक्ष बने जब विपक्ष के कुछ सदस्यों ने उनकी कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताई।
- प्रस्ताव का मुख्य कारण स्थगन प्रस्तावों तथा प्रश्नों को स्वीकार न किए जाने पर असहमति थी और विपक्ष ने इसे संसदीय उत्तरदायित्व को सीमित करने वाला कदम बताया।
- डॉ. एन. बी. खरे ने अध्यक्ष के निर्णयों की आलोचना करते हुए सदन में अस्वीकृत प्रश्नों का उल्लेख किया और उन्हें मनमाना बताया।
- तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मावलंकर का समर्थन करते हुए कहा कि पद से हटाने जैसा प्रस्ताव केवल अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में ही लाया जाना चाहिए।
- मावलंकर ने संसदीय समितियों को सुदृढ़ करने, उत्तरदायित्व बढ़ाने तथा विधायी संस्थाओं की स्वायत्तता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- लोकसभा ने अंततः ध्वनिमत से पद से हटाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और मावलंकर अपने पद पर बने रहे।
- इस बहस ने संसदीय अनुशासन और विपक्ष को सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने के अवसरों के बीच संतुलन के महत्व को रेखांकित किया।
- यह ऐतिहासिक घटना आज भी प्रासंगिक मानी जाती है क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष के पद से जुड़े प्रस्तावों पर समय-समय पर संसदीय चर्चा होती रहती है।





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