धर्म सभा की स्थापना 1830 में कलकत्ता में पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों की रक्षा और सामाजिक सुधार आंदोलनों के विरोध के उद्देश्य से की गई थी।
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- धर्म सभा की स्थापना 1830 में राधाकांत देव ने कलकत्ता में पारंपरिक हिंदू धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा के लिए की थी।
- यह संगठन उस समय उभरा जब औपनिवेशिक प्रभाव, पश्चिमी शिक्षा और सुधारवादी विचार भारतीय समाज तथा संस्कृति को तेजी से प्रभावित कर रहे थे।
- धर्म सभा ने राजा राम मोहन राय के ब्रह्म समाज का विरोध किया और सती प्रथा समाप्ति तथा विधवा पुनर्विवाह जैसे सुधारों का प्रतिरोध किया।
- राधाकांत देव ने पारंपरिक विचार रखने के बावजूद अंग्रेजी शिक्षा और महिलाओं की शिक्षा के प्रसार का समर्थन किया था।
- संगठन ने 1829 में सती प्रथा प्रतिबंध कानून का विरोध किया और 1856 के हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम के खिलाफ याचिकाएं दायर कीं।
- धर्म सभा ने समाचार चंद्रिका समाचार पत्र के माध्यम से रूढ़िवादी विचारों का प्रचार करते हुए हिंदू परंपराओं के समर्थन में जनमत तैयार किया।
- इस संगठन ने औपनिवेशिक काल में बढ़ते पश्चिमी प्रभाव के बीच रूढ़िवादी हिंदू पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
- धर्म सभा से प्रेरित होकर बाद में सनातन धर्म सभा, धर्म महामंडली और भारत धर्म महामंडल जैसे कई रूढ़िवादी संगठन स्थापित हुए।





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