दुनियाभर में मृत्युदंड पर बहस जारी है। भारत में यह केवल “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामलों में लागू होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदंड और दया याचिकाओं की प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के लिए कई दिशानिर्देश जारी किए हैं।
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- भारत में गंभीर अपराधों के लिए मृत्युदंड की व्यवस्था बनी हुई है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने 1983 में कहा – मृत्युदंड केवल “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामलों में।
- हत्या (धारा 302) और बलात्कार (धारा 376A) जैसे अपराधों में मृत्युदंड संभव।
- 2013 संशोधन के बाद, बलात्कार से मृत्यु होने पर मृत्युदंड का प्रावधान।
- सती रोकथाम अधिनियम, एनडीपीएस अधिनियम आदि में भी मृत्युदंड का प्रावधान।
- उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की पुष्टि के बाद दया याचिका दायर की जा सकती है।
- अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति दया या क्षमादान दे सकते हैं, सलाह गृह मंत्रालय की।
- दया निर्णय में देरी होने पर मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है।
- शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ (2014) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 12 दिशानिर्देश दिए।
- दया याचिका अस्वीकार होने और फांसी के बीच 14 दिन का अंतर अनिवार्य किया गया।
- हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (महाराष्ट्र बनाम प्रदीप कोकड़े) ने राज्यों को दया याचिकाओं हेतु समर्पित सेल बनाने का निर्देश दिया।
- राज्यों को ईमेल आधारित प्रक्रिया, विधिक सहायता और समय पर कार्यवाही सुनिश्चित करनी होगी।





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