न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए बने अवमानना कानून पर अब पुनर्विचार की मांग तेज़ है। कई हालिया घटनाओं ने इस पर बहस को जन्म दिया है कि क्या यह कानून न्याय की रक्षा से अधिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब इस कानून में संतुलन जरूरी है।
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- न्यायालय के आदेश की अवहेलना या असम्मान को अवमानना कहा जाता है।
- संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 से उच्च न्यायालयों को यह शक्ति प्राप्त।
- दो प्रकार: सिविल अवमानना (आदेश का उल्लंघन) और आपराधिक अवमानना (न्यायालय की प्रतिष्ठा घटाना)।
- 2006 संशोधन से “सत्य” और “सार्वजनिक हित” को बचाव के रूप में मान्यता मिली।
- न्यायमूर्ति काटजू और न्यायमूर्ति कर्णन के मामलों ने दुरुपयोग पर सवाल उठाए।
- अरुंधति रॉय, दूदा पी.एन. जैसे मामलों में सद्भावनापूर्ण आलोचना को वैध माना गया।
- आलोचना: अवमानना शक्ति का प्रयोग अक्सर न्यायाधीशों की रक्षा हेतु, न्याय हेतु नहीं।
- न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने कहा—अवमानना कानून अस्पष्ट, नागरिक स्वतंत्रता पर अंकुश।
- अमेरिका जैसे देशों में आलोचना या मीडिया को अवमानना से नहीं रोका जाता।
- सुधार की ज़रूरत — कानून न्यायालय के कार्य में सहायता करे, आलोचना को न रोके।





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