ICAR–सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI) ने मैंग्रोव क्लैम (Geloina erosa) का नियंत्रित परिस्थितियों में सफल प्रजनन कर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। यह उपलब्धि घटते ज्वारीय संसाधनों के पुनर्स्थापन और मैंग्रोव संरक्षण आधारित सतत जलीय कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
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- CMFRI ने मैंग्रोव क्लैम (Geloina erosa) का कैप्टिव परिस्थितियों में प्रेरित प्रजनन सफलतापूर्वक किया।
- यह उपलब्धि सामुदायिक प्रबंधित ज्वारीय जलीय कृषि मॉडल को मैंग्रोव संरक्षण से जोड़ने में सहायक होगी।
- मैंग्रोव क्लैम एक पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण द्विपत्री प्रजाति है, जो दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाती है।
- उत्तरी केरल में इसे “कंडल कक्का” के नाम से जाना जाता है और यह स्थानीय व्यंजन के रूप में लोकप्रिय है।
- यह प्रजाति मैंग्रोव के ज्वारीय क्षेत्रों में कार्बनिक पदार्थों से समृद्ध कीचड़युक्त सतह पर पाई जाती है।
- CMFRI के मैरिकल्चर डिवीजन के वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक स्पॉनिंग और पूर्ण लार्वा विकास चक्र पूरा किया।
- स्पॉनिंग के 18वें दिन सफल स्पैट सेटलमेंट दर्ज किया गया।
- यह उपलब्धि विश्व में मैंग्रोव क्लैम के प्रेरित प्रजनन के दुर्लभ उदाहरणों में से एक है।
- वैज्ञानिक बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन के लिए लार्वा पालन और नर्सरी प्रबंधन प्रोटोकॉल विकसित कर रहे हैं।
- हैचरी में उत्पादित बीज कम लागत और पर्यावरणीय रूप से सतत जलीय कृषि को बढ़ावा देंगे।
- इन बीजों का उपयोग क्षतिग्रस्त मैंग्रोव क्षेत्रों में पुनर्स्थापन के लिए किया जा सकता है।
- यह पहल मैंग्रोव-निर्भर समुदायों के लिए आजीविका और पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करेगी।
- अत्यधिक दोहन, आवास क्षरण, प्रदूषण और तटीय विकास के कारण जंगली भंडार घट रहे हैं।
- वैज्ञानिक आकलन और नियमन की कमी ने इस गिरावट को और बढ़ाया है।
- मैंग्रोव क्लैम 10 सेमी तक बढ़ सकता है और पोषक तत्व पुनर्चक्रण तथा अवसाद स्थिरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।





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