1853 का चार्टर एक्ट ब्रिटिश संसद ने लॉर्ड डलहौज़ी के समय पारित किया। यह ईस्ट इंडिया कंपनी का अंतिम चार्टर था, जिसमें विधायी सुधार, सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता और क्राउन की अधिक निगरानी शामिल थी। इसने भारत की आधुनिक संसदीय प्रणाली की शुरुआत की और कंपनी शासन के अंत का संकेत दिया।
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- 1853 में पारित, ईस्ट इंडिया कंपनी का अंतिम चार्टर
- कंपनी की शक्तियाँ अनिश्चित समय के लिए बढ़ीं
- गवर्नर-जनरल की काउंसिल में विधायी व कार्यकारी शक्तियाँ अलग हुईं
- काउंसिल में 6 नए विधायी सदस्य जोड़े गए
- इंडियन (सेंट्रल) लेजिस्लेटिव काउंसिल का गठन, मिनी-पार्लियामेंट जैसा
- सिविल सेवा में खुली प्रतियोगी परीक्षा लागू (मैकॉले समिति, 1854)
- भारतीयों को योग्यता के आधार पर सिविल सेवा में प्रवेश मिला
- कंपनी निदेशक मंडल के 18 में से 6 सदस्य क्राउन द्वारा नामित
- बंगाल के लिए अलग गवर्नर, नए प्रांत बनाने की शक्ति
- आधुनिक विधायिका की नींव रखी, पर भारतीय प्रतिनिधित्व नहीं दिया
- कंपनी से संसद की ओर नियंत्रण का झुकाव बढ़ा
- आलोचना: केंद्रीकृत शक्ति, भारतीयों की उपेक्षा





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