भारत 12 से 13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित करेगा, जहां ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के मतभेद बड़ी चुनौती बनेंगे।
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- भारत नई दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं के शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा, जिसका उद्देश्य आंतरिक मतभेदों के बावजूद संगठन का वैश्विक प्रभाव बढ़ाना है।
- पश्चिम एशिया संघर्ष ने ब्रिक्स सदस्य ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनाव बढ़ाकर सर्वसम्मति आधारित निर्णय प्रक्रिया को चुनौती दी है।
- ईरान और अमेरिका तथा इजरायल के बीच संघर्ष ने क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित की है और तेल व्यापार के प्रमुख समुद्री मार्ग को बाधित किया है।
- ईरानी मिसाइल हमलों के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने अगस्त में ईरान के साथ व्यापार और वित्तीय लेनदेन रोक दिए थे।
- ब्रिक्स देशों को पश्चिम एशिया संकट पर ऐसी भाषा तय करनी होगी, जिसे ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों स्वीकार कर सकें।
- चीन की भागीदारी भारत के साथ संगठन की एकता बनाए रखने और विस्तारित समूह को मजबूत करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका दर्शाती है।
- रूस, ईरान, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और इंडोनेशिया के नेता भी सम्मेलन में शामिल होंगे तथा संयुक्त राष्ट्र महासचिव भी उपस्थित रहेंगे।
- ब्रिक्स के विस्तार से वैश्विक प्रतिनिधित्व बढ़ा है, लेकिन अलग हितों वाले नए सदस्यों ने सर्वसम्मति बनाना अधिक कठिन कर दिया है।
- पिछली ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के मतभेदों के कारण संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं हो सका था।
- शंघाई सहयोग संगठन की बैठक ने उम्मीद जगाई, क्योंकि सदस्य देशों ने ईरान संघर्ष पर अलग-अलग दृष्टिकोणों के बावजूद स्वीकार्य भाषा तय की थी।
- अमेरिका की शुल्क नीतियां और संरक्षणवादी कदम ब्रिक्स देशों को आर्थिक सहयोग बढ़ाने तथा साझा प्रतिक्रियाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
- नई दिल्ली सम्मेलन यह परखेगा कि ब्रिक्स भू राजनीतिक मतभेदों को दूर करके उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग कितना मजबूत कर सकता है।





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