असम समान नागरिक संहिता विधेयक 2026 विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों के लिए एक समान कानूनी ढांचा स्थापित करता है, जबकि अनुसूचित जनजातियों को इससे बाहर रखा गया है।
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- असम विधानसभा ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) असम विधेयक, 2026 पारित किया, जिससे असम पूर्वोत्तर भारत का पहला और देश का तीसरा राज्य बन गया जिसने ऐसा कानून अपनाया है।
- विधेयक बहुविवाह और द्विविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है तथा उल्लंघन करने पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान करता है।
- असम की अनुसूचित जनजातियों को उनकी पारंपरिक प्रथाओं और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।
- लिव-इन संबंधों का पंजीकरण एक माह के भीतर अनिवार्य किया गया है तथा ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को वैध माना जाएगा।
- लिव-इन संबंध में परित्यक्त महिलाओं को भरण-पोषण का दावा करने का कानूनी अधिकार प्रदान किया गया है।
- विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य बनाया गया है तथा विवाह की न्यूनतम आयु पुरुषों के लिए 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई है।
- विधेयक धर्म की परवाह किए बिना पति-पत्नी, बच्चों और माता-पिता के लिए समान उत्तराधिकार अधिकार सुनिश्चित करता है।
- समान नागरिक संहिता का संवैधानिक आधार राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत आने वाले अनुच्छेद 44 में निहित है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो (1985), सरला मुद्गल (1995), शायरा बानो (2017) और जोस पाउलो कूटिन्हो (2019) जैसे मामलों में यूसीसी के पक्ष में महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।
- समर्थकों के अनुसार यूसीसी लैंगिक न्याय, समानता और राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देता है, जबकि आलोचक धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और सांस्कृतिक स्वायत्तता पर प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं।





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