अकाली आंदोलन एक प्रमुख सिख सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन था, जिसने गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतों से मुक्त कर सिख समुदाय की धार्मिक पहचान को मजबूत किया।
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अकाली आंदोलन, जिसे गुरुद्वारा सुधार आंदोलन भी कहा जाता है, का उद्देश्य सिख गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतों से मुक्त कर सामुदायिक नियंत्रण स्थापित करना था।
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प्रारंभ में यह एक धार्मिक सुधार प्रयास था, लेकिन धीरे-धीरे यह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गया।
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गुरुद्वारे मूल रूप से धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक केंद्र थे, परंतु बाद में उदासी महंतों के नियंत्रण में आकर सिख परंपराओं से भटक गए।
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कर्तार सिंह जब्बार, बाबा खड़क सिंह, मास्टर तारा सिंह और मेहताब सिंह जैसे नेताओं ने अहिंसक संघर्ष के माध्यम से सिखों को संगठित किया।
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1920 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की स्थापना गुरुद्वारों के लोकतांत्रिक और संगठित प्रबंधन के लिए की गई।
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ब्रिटिश सरकार ने कभी तटस्थता तो कभी दमन की नीति अपनाई, विशेषकर ननकाना साहिब हत्याकांड के बाद स्थिति गंभीर हो गई।
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इस आंदोलन ने सिख धार्मिक पहचान को सुदृढ़ किया और पंजाब में भविष्य के सिख राजनीतिक नेतृत्व को तैयार किया।
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आंदोलन का समापन सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 से हुआ, जिसने सिखों को गुरुद्वारों पर कानूनी और लोकतांत्रिक अधिकार दिए।





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