भारतीय परिषद अधिनियम 1892 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया। इसका उद्देश्य विधायी परिषदों का विस्तार और भारतीय भागीदारी बढ़ाना था, लेकिन अधिकार बहुत सीमित थे। यह भारत में प्रतिनिधि शासन की दिशा में पहला कदम माना जाता है।
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- अधिनियम 1892 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित
- केंद्रीय व प्रांतीय विधायी परिषदों का आकार बढ़ाया गया
- केंद्रीय परिषद: 10–16 सदस्य, आधे गैर-सैन्य, अधिकतर गैर-आधिकारिक
- प्रांतीय परिषदें विस्तारित: बंबई 8, मद्रास 20, बंगाल 20, उत्तर-पश्चिम 15, अवध 15
- विश्वविद्यालय, नगरपालिका, जमींदार, वाणिज्य मंडल नामांकन कर सकते थे
- सदस्य बजट पर चर्चा कर सकते थे, लेकिन संशोधन का अधिकार नहीं
- सार्वजनिक मामलों पर सरकार से प्रश्न पूछने का सीमित अधिकार
- परिषदों में अब भी आधिकारिक बहुमत, निर्णय औपनिवेशिक हित में
- भारत में प्रतिनिधि शासन की दिशा में पहला कदम
- आलोचना हुई; क्रांतिकारी आंदोलनों को प्रेरित किया





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