भारत में किसान आंदोलन 18वीं से 20वीं सदी के बीच ब्रिटिश शासन में उभरे। कठोर लगान प्रथा, ज़मींदारों और साहूकारों का शोषण, और औपनिवेशिक आर्थिक नीतियाँ इनके प्रमुख कारण थे। ये आंदोलन ब्रिटिश शासन उखाड़ने के लिए नहीं थे, लेकिन इन्होंने कृषक राजनीति को बदला और राष्ट्रीय चेतना को मज़बूत किया।
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- 18वीं–20वीं सदी में औपनिवेशिक शोषण के बीच शुरुआत
- कारण: ज़मींदारी में ऊँचे किराये, अवैध कर, बेदखली, बेगार
- रैयतवारी इलाकों में भारी भूमि कर
- साहूकारों ने ऊँचा ब्याज लिया, ज़मीन-पशु छीन लिए
- किसान बने मज़दूर, हिस्सेदार, बेज़मीन मज़दूर
- प्रमुख आंदोलन: नील विद्रोह (1859–60), संथाल विद्रोह (1855), दक्कन विद्रोह (1875), बारडोली सत्याग्रह (1926)
- अन्य: रंगपुर डिंग, नारकेलबेरिया, मपिल्ला, तेभगा, तेलंगाना, मुंडा उलगुलान
- वजहें: ज़मीन जब्ती, बढ़ता लगान, कर्ज़ का बोझ, कुटीर उद्योग का नाश
- असर: किसानों ने अधिकार माँगे, किसान सभाएँ बनीं, शोषण का प्रतिरोध किया
- राष्ट्रीय आंदोलन को बल मिला, कृषक एकता मज़बूत हुई





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