मंदिर प्रवेश आंदोलन का उद्देश्य निम्न जातियों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिलाना था। यह 20वीं सदी की शुरुआत में केरल से शुरू हुआ और पूरे भारत में फैल गया। सत्याग्रह, उपवास और जन आंदोलनों के माध्यम से यह आंदोलन जातीय भेदभाव के खिलाफ एक मजबूत कदम बना।
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- आंदोलन का लक्ष्य: सभी जातियों को मंदिर प्रवेश दिलाना
- श्री नारायण गुरु, पेरियार जैसे समाज सुधारकों ने नेतृत्व किया
- वैकोम सत्याग्रह (1924) पहला बड़ा विरोध आंदोलन
- गुरुवायूर आंदोलन में सत्याग्रहियों पर हिंसा, फिर भी जारी रहा
- गांधी, केलप्पन, ए.के. गोपालन जैसे नेताओं की अहम भूमिका
- जुलूस, उपवास, प्रचार से आंदोलन ने जन समर्थन पाया
- 1936 में त्रावणकोर महाराजा ने सभी मंदिरों को सभी हिंदुओं के लिए खोला
- मद्रास ने भी इसका पालन किया, सभी जातियों को मंदिर में प्रवेश मिला
- आंदोलन ने समाज सुधार को गति दी, पर जातिवाद खत्म नहीं हुआ
- भारतीय संविधान में अस्पृश्यता विरोधी प्रावधानों पर पड़ा असर





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