1951 में, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संविधान में संशोधन कर स्वतंत्रता की मूलभूत अधिकार को सीमित करने का ऐतिहासिक कदम उठाया। बढ़ते साम्प्रदायिक तनाव और राजनीतिक विरोध के बीच, नेहरू को यह डर था कि बिना किसी नियंत्रण के स्वतंत्रता हिंसा और अशांति को बढ़ावा दे सकती है, जिस कारण उन्होंने संविधान में बदलाव की कोशिश की, खासकर धारा 19(1)(a) पर।
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- नेहरू ने भारतीय संविधान की धारा 19(1)(a) में संशोधन की कोशिश की, जो स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का अधिकार देती है।
- 1951 में किया गया पहला संशोधन नफरत भरे भाषणों और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए था।
- नेहरू को विभाजन के बाद भारत में साम्प्रदायिक तनाव की चिंता थी, जो अवरुद्ध अभिव्यक्ति के कारण बढ़ रहा था।
- 1950 में बॉम्बे हाई कोर्ट का निर्णय नेहरू के लिए चुनौती बन गया, जो राज्य सत्ता के खिलाफ संवैधानिक उपायों का उदाहरण बना।
- नेहरू और सरदार पटेल के बीच संविधान की सीमाओं को लेकर चर्चा हुई, जहां पटेल ने स्वतंत्रता को सीमित करने के बारे में कानूनी तर्क दिया।
- RSS के आर्गनाइज़र और क्रॉस रोड्स जैसे प्रेस ने नेहरू की आलोचना की, जिससे उन्हें कार्रवाई करनी पड़ी।
- रोमेश ठपार बनाम मद्रास राज्य जैसे मामलों में कोर्ट ने राज्य द्वारा भाषण पर प्रतिबंधों को असंवैधानिक ठहराया।
- नेहरू का मानना था कि संविधान में अभिव्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता हिंसा को बढ़ावा दे सकती है और राष्ट्रीय एकता को खतरे में डाल सकती है।
- पहला संशोधन, जो जून 1951 में पास हुआ, ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए थे ताकि इसके दुरुपयोग को रोका जा सके।
- नेहरू ने कहा कि स्वतंत्रताओं को संतुलित करना जरूरी है, क्योंकि केवल स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हैं।





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