संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण सम्मेलन ने भूमि पुनर्स्थापन के वित्तीय संकट को रेखांकित किया, जबकि भारत में घासभूमि संरक्षण और कार्बन बाजार पर बहस तेज है।
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- संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण सम्मेलन का 17वां सत्र उलानबटार में समाप्त हुआ, जहां भूमि पुनर्स्थापन के लिए वित्तपोषण प्रमुख विषय रहा।
- वर्ष 2030 तक भूमि पुनर्स्थापन के लिए प्रतिवर्ष लगभग 355 अरब डॉलर चाहिए, जबकि वर्तमान में लगभग 77 अरब डॉलर ही उपलब्ध हैं।
- सम्मेलन में प्रकृति और जैव विविधता आधारित ऋणों को बढ़ावा दिया गया तथा चरागाह क्षेत्रों के लिए 1.2 अरब डॉलर की वित्तीय पहल शुरू हुई।
- भारत में घासभूमि, सवाना और झाड़ीदार क्षेत्रों को अनुपयोगी भूमि मानने की पुरानी सोच अब बदल रही है।
- हरित ऋण कार्यक्रम में खराब मानी गई भूमि पर वृक्षारोपण की अनुमति से प्राकृतिक घासभूमियों पर पेड़ लगाने को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं बढ़ी हैं।
- जून 2026 के एक अध्ययन ने भारतीय घासभूमियों को महत्वपूर्ण कार्बन भंडार बताया और उनके पुनर्स्थापन को कार्बन वित्त से जोड़ने की संभावना बताई।
- भारत के औपचारिक कार्बन बाजार में अभी घासभूमि या चरागाह मिट्टी में कार्बन भंडारण के लिए स्वीकृत पद्धति मौजूद नहीं है।
- मिट्टी में कार्बन की मात्रा मापना और सत्यापित करना कठिन है, जिससे कार्बन मूल्यांकन, स्थायित्व और अतिरिक्तता से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
- ऑस्ट्रेलिया के अनुभवों ने मिट्टी आधारित कार्बन ऋणों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं, जहां वर्षा ने मापे गए लाभ को प्रभावित किया।
- कार्बन केंद्रित गतिविधियां मिट्टी में अनावश्यक हस्तक्षेप या वृक्षारोपण को बढ़ावा दे सकती हैं, जिससे प्राकृतिक घासभूमि की पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है।
- भारत की उभरती कार्बन वित्त व्यवस्था में ऐसे संरक्षण उपाय आवश्यक हैं, जो जैव विविधता बचाएं और प्राकृतिक घासभूमियों को वृक्षारोपण से सुरक्षित रखें।
- यह बहस बताती है कि घासभूमियों को मूल्यवान पारिस्थितिकी तंत्र मानने के साथ बाजार आधारित संरक्षण में पुराने वृक्षारोपण दृष्टिकोण से बचना जरूरी है।





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