1849 में बॉम्बे में स्थापित परमहंस मंडली ने समानता, तर्कवाद, महिला अधिकारों और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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- परमहंस मंडली की स्थापना 1849 में बॉम्बे में दादोबा पांडुरंग और दुर्गाराम मेहताजी सहित प्रगतिशील सुधारकों द्वारा की गई थी।
- यह संगठन उन्नीसवीं शताब्दी के भारत में जातिगत भेदभाव और रूढ़िवादी सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं के खिलाफ महत्वपूर्ण सुधार आंदोलन बनकर उभरा।
- परमहंस मंडली ने एक निराकार ईश्वर में विश्वास का समर्थन किया और मूर्ति पूजा तथा जटिल धार्मिक कर्मकांडों का विरोध किया।
- दादोबा पांडुरंग ने “धर्म विवेचन” में संगठन के सिद्धांतों को तर्कवाद, समानता, नैतिकता और स्वतंत्र चिंतन पर आधारित बताया।
- संगठन ने विभिन्न जातियों के लोगों के सामूहिक भोज और बैठकों का आयोजन कर जातिगत बाधाओं को तोड़ने का प्रयास किया।
- परमहंस मंडली ने महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और बाल विवाह जैसी कुरीतियों का विरोध किया।
- आंदोलन ने अंधविश्वास और धार्मिक रूढ़ियों के स्थान पर वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद और सामाजिक समानता को बढ़ावा दिया।
- परमहंस मंडली के विचारों ने बाद में प्रार्थना समाज और सत्यशोधक समाज जैसे प्रमुख सामाजिक सुधार आंदोलनों को प्रभावित किया।





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