ओडिशा में केन्दु पत्ते के व्यापार में नीतिगत बाधाओं के कारण वन आधारित समुदायों की आय प्रभावित हो रही है, जबकि उन्हें वन अधिकार कानून 2006 के तहत अधिकार प्राप्त हैं।
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- कोरापुट जिले के कई ग्राम सभाएं अभी तक सरकारी अनुमति का इंतजार कर रही हैं, जिससे वे केन्दु पत्तों का स्वतंत्र रूप से व्यापार कर सकें और अपनी आय में वृद्धि कर सकें।
- केन्दु पत्ते, जिन्हें हरित सोना कहा जाता है, बीड़ी निर्माण में उपयोग होते हैं और आदिवासी तथा वन क्षेत्रों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार हैं।
- वन अधिकार कानून 2006 के अंतर्गत केन्दु पत्तों को लघु वन उपज के रूप में मान्यता दी गई है, जिससे समुदायों को इनके संग्रह, उपयोग और विक्रय का अधिकार मिलता है।
- संशोधन के बाद ग्राम सभाओं को परिवहन अनुमति जारी करने और भंडारण तथा विक्रय प्रबंधन का अधिकार दिया गया, जिससे स्थानीय नियंत्रण को बढ़ावा मिल सके।
- इसके बावजूद राज्य स्तर की अतिरिक्त अनुमति के बिना समुदाय सीधे व्यापार नहीं कर सकते, जिससे उनकी आय सीमित हो जाती है और निर्भरता बनी रहती है।
- इस वर्ष अनुमति के अभाव में व्यापारी गांवों तक नहीं पहुंचे, जिसके कारण लोगों को अपने उत्पाद कम मूल्य पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा।
- पिछले वर्ष भी अनुमति में देरी के कारण बड़ी मात्रा में एकत्रित पत्ते वर्षा से खराब हो गए, जिससे लाखों रुपये का नुकसान हुआ।
- यह स्थिति नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन में कमी को दर्शाती है, जिससे स्थानीय आजीविका, स्वशासन और आर्थिक अवसर प्रभावित हो रहे हैं।





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