लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव फिर चर्चा में है, जिससे शासन स्थिरता, संघीय संतुलन, खर्च और संवैधानिक व्यवहार्यता पर बहस तेज हुई है।
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- एक साथ चुनाव का अर्थ है लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव प्रत्येक पांच वर्ष में एक ही समय पर कराना।
- स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में भारत में यही व्यवस्था लागू थी, लेकिन समयपूर्व विघटन के कारण यह क्रम टूट गया।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार होने वाले चुनावी खर्च और प्रशासनिक व्यवधान को कम करने के लिए इस प्रस्ताव का समर्थन किया है।
- समर्थकों का कहना है कि इससे प्रशासनिक लागत घटेगी, आचार संहिता की बार-बार लागू होने वाली स्थिति कम होगी और नीतिगत स्थिरता बढ़ेगी।
- आलोचकों का मत है कि इससे संघीय ढांचे पर प्रभाव पड़ सकता है और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के सामने कमजोर पड़ सकते हैं।
- संविधान के अनुच्छेद तिरासी और एक सौ बहत्तर समयपूर्व विघटन की अनुमति देते हैं, जिससे निश्चित पांच वर्षीय कार्यकाल सुनिश्चित करना जटिल हो जाता है।
- पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति ने चरणबद्ध तरीके से इस व्यवस्था को लागू करने की सिफारिश की है।
- अध्ययनों के अनुसार एक साथ चुनाव होने पर मतदाता केंद्र और राज्य स्तर पर एक ही दल को चुनने की संभावना अधिक रहती है, जिससे लोकतांत्रिक व्यवहार प्रभावित हो सकता है।





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