लोक अदालत और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण भारत में सस्ती और त्वरित न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं तथा समाज के कमजोर वर्गों को निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करते हैं।
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- लोक अदालत का अर्थ जन न्यायालय है, जो समझौता, मध्यस्थता और सहमति के आधार पर विवादों का समाधान कर औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया का प्रभावी विकल्प प्रदान करता है।
- स्वतंत्रता के बाद पहली लोक अदालत का आयोजन वर्ष उन्नीस सौ बयासी में गुजरात में हुआ और बाद में इसे विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम उन्नीस सौ सत्तासी के तहत वैधानिक मान्यता मिली।
- लोक अदालत न्यायालयों में लंबित मामलों तथा पूर्व वाद विवादों दोनों का निपटारा कर सकती है, जिससे न्याय प्रक्रिया तेज और सरल बनती है।
- सामान्यतः लोक अदालत की पीठ में एक न्यायिक अधिकारी अध्यक्ष के रूप में तथा एक अधिवक्ता और एक समाजसेवी सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
- लोक अदालत दीवानी मामलों और समझौता योग्य आपराधिक मामलों का निपटारा कर सकती है, परंतु असमझौता योग्य अपराधों पर इसका अधिकार क्षेत्र नहीं होता।
- लोक अदालत द्वारा दिया गया निर्णय दीवानी न्यायालय के आदेश के समान माना जाता है और यह दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
- लोक अदालत के प्रमुख प्रकार राष्ट्रीय लोक अदालत, राज्य स्तरीय नियमित लोक अदालत तथा स्थायी लोक अदालत हैं जो सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं से जुड़े विवादों को देखते हैं।
- राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण देशभर में विधिक सहायता कार्यक्रमों की नीति बनाता है तथा राज्य और जिला स्तर पर विधिक सेवा संस्थाओं की गतिविधियों का समन्वय करता है।





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