एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया है कि हीटवेव के दौरान ओज़ोन प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है, जिससे हृदय और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के कारण मृत्यु का जोखिम भी बढ़ता है। यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण के संयुक्त प्रभावों को उजागर करता है।
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- हालिया शोध में भारत में हीटवेव और ओज़ोन प्रदूषण के संयुक्त प्रभावों का अध्ययन किया गया।
- अध्ययन के अनुसार हीटवेव के दौरान सतही ओज़ोन का स्तर काफी बढ़ जाता है।
- सतही ओज़ोन एक हानिकारक वायु प्रदूषक है जो हृदय और फेफड़ों को प्रभावित करता है।
- हीटवेव के दौरान उत्तरी भारत में ओज़ोन स्तर 85–110 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया।
- यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 70 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर सीमा से अधिक है।
- अध्ययन में भारत के सभी क्षेत्रों में ओज़ोन स्तर WHO मानकों से ऊपर पाया गया।
- हीटवेव समाप्त होने के तीन से चार दिनों के भीतर ओज़ोन स्तर सामान्य होने लगता है।
- उच्च तापमान ओज़ोन बनने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं को तेज़ कर देता है।
- अधिक ओज़ोन के संपर्क से हृदय और श्वसन रोगों का खतरा बढ़ता है।
- अध्ययन ने ओज़ोन प्रदूषण को इस्केमिक हृदय रोग और COPD से होने वाली मौतों से जोड़ा।
- COPD का अर्थ है क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़, जो एक गंभीर फेफड़ों की बीमारी है।
- वर्ष 2024 की हीटवेव अवधि में लगभग 26,500 मौतें ओज़ोन प्रदूषण से संबंधित पाई गईं।
- शोधकर्ताओं के अनुसार हीटवेव के दौरान लगभग 830 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं।
- हीटवेव वायु प्रदूषण के प्रभाव को और अधिक गंभीर बना देती है।
- सतही ओज़ोन, वायुमंडल की ऊपरी परत में मौजूद सुरक्षात्मक ओज़ोन से अलग होती है।
- यह प्रदूषण वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषकों पर सूर्य के प्रकाश की प्रतिक्रिया से बनता है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है।
- अध्ययन जलवायु संकट और वायु गुणवत्ता के बीच बढ़ते संबंध को दर्शाता है।
- उत्सर्जन में कमी और प्रभावी हीट एक्शन प्लान स्वास्थ्य जोखिमों को कम कर सकते हैं।
- यह शोध भारत में जलवायु और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के बेहतर समन्वय की आवश्यकता को रेखांकित करता है।





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