भारत की विदेश नीति समय के साथ विकसित होकर औपनिवेशिक प्रभाव से स्वतंत्र कूटनीतिक दृष्टिकोण तक पहुँची, जिसमें गुटनिरपेक्षता, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता पर बल दिया गया।
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• स्वतंत्रता से पहले भारत की विदेश नीति ब्रिटिश शासन के नियंत्रण में थी और इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के राजनीतिक तथा आर्थिक हितों का समर्थन करना था।
• भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने उपनिवेशवाद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए वैश्विक समर्थन प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
• स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व और स्वतंत्र कूटनीतिक दृष्टिकोण के आधार पर भारत की विदेश नीति को नई दिशा दी।
• पंचशील सिद्धांतों ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संप्रभुता के सम्मान, आक्रमण न करने, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धांतों को स्थापित किया।
• इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने क्षेत्रीय प्रभाव को मजबूत किया, उन्नीस सौ चौहत्तर में परमाणु परीक्षण किया और सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि को मजबूत बनाया।
• उन्नीस सौ नब्बे के दशक में आर्थिक सुधारों के बाद विदेश नीति में आर्थिक कूटनीति, व्यापार विस्तार और वैश्विक निवेश को आकर्षित करने पर अधिक जोर दिया गया।
• उन्नीस सौ अट्ठानवे के परमाणु परीक्षण और कारगिल संघर्ष जैसे घटनाक्रमों ने भारत की सुरक्षा रणनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक स्थिति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया।
• हाल के वर्षों में पड़ोसी प्रथम और पूर्व की ओर नीति के माध्यम से भारत ने क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाया और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक भूमिका को मजबूत किया।





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