चौथ और सरदेशमुखी मराठा शासन की प्रमुख कर व्यवस्था थीं, जिन्होंने स्थायी आय, सैन्य विस्तार और दक्कन क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव को मजबूत किया।
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- चौथ एक वार्षिक कर था, जो कुल राजस्व का एक-चौथाई हिस्सा होता था और मराठों द्वारा बाहरी क्षेत्रों से वसूला जाता था।
- सरदेशमुखी अतिरिक्त कर था, जो कुल राजस्व का एक-दसवां हिस्सा होता था और इसे छत्रपति शिवाजी ने पारंपरिक अधिकार बताया था।
- यह राजस्व व्यवस्था 1664 से 1670 के बीच सूरत पर छत्रपति शिवाजी के अभियानों के बाद विकसित हुई थी।
- चौथ और सरदेशमुखी ने मुल्कगिरी जैसी लूट आधारित व्यवस्था की जगह लेकर संगठित और स्थायी आर्थिक प्रणाली का रूप लिया।
- इन करों से प्राप्त आय ने मराठा सेना के विस्तार, प्रशासनिक मजबूती और नए क्षेत्रों में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- मुगल सम्राट रफ़ी-उद-दराजत ने बाद में राजा शाहू को दक्कन के छह मुगल प्रांतों से चौथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार दिया।
- चौथ के बदले मराठों ने मुगल सम्राट को सैन्य सहायता और विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी स्वीकार की थी।
- इस दोहरी





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