भारत में ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था 18वीं से 20वीं सदी के मध्य तक विकसित हुई। इसका उद्देश्य शासन पर नियंत्रण, राजस्व संग्रह और साम्राज्यवादी हितों की रक्षा करना था, जिसका प्रभाव आज भी भारतीय प्रशासन में दिखता है।
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1858 के बाद क्राउन शासन लागू कर केंद्रीकृत प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित किया गया, जिससे पूरे भारत पर ब्रिटिश सत्ता मजबूत हुई
भारतीय सिविल सेवा (ICS) की स्थापना कर जिलों में प्रशासन, राजस्व व कानून व्यवस्था संभालने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति हुई
जमींदारी, रैयतवारी और महालवारी जैसी भूमि राजस्व प्रणालियां लागू कर किसानों से अधिकतम कर वसूला गया
एक समान कानूनी व्यवस्था, अदालतें और संहिताबद्ध कानून लागू कर पूरे क्षेत्र में न्यायिक ढांचा विकसित किया गया
पुलिस, सेना और जेल व्यवस्था का गठन कर आंतरिक सुरक्षा और विरोध आंदोलनों को नियंत्रित किया गया
रेलवे, टेलीग्राफ और बंदरगाह जैसे ढांचे विकसित किए गए, मुख्य रूप से प्रशासन और व्यापारिक हितों के लिए
पश्चिमी शिक्षा प्रणाली शुरू की गई, जिससे शिक्षित भारतीय वर्ग तो बना लेकिन सीमित प्रशासनिक अवसर मिले
नस्लीय भेदभाव के कारण योग्य भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों से वंचित रखा गया
यह व्यवस्था प्रशासनिक रूप से सक्षम थी, लेकिन आम जनता के कल्याण और राजनीतिक अधिकारों की उपेक्षा करती रही





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