धर्मांतरण विरोधी कानून राज्य स्तरीय विधियाँ हैं जिनका उद्देश्य बल, धोखाधड़ी, प्रलोभन या दबाव द्वारा धर्म परिवर्तन को रोकना है।
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- धर्मांतरण विरोधी कानून, जिन्हें धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम भी कहा जाता है, बल, प्रलोभन, धोखे या अनुचित प्रभाव से किए गए धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध लगाते हैं।
- कुछ राज्यों में धर्म परिवर्तन से पूर्व जिला प्रशासन को सूचना देना या अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है।
- इन कानूनों के उल्लंघन पर जुर्माना तथा कारावास का प्रावधान है।
- इनकी आवश्यकता बलपूर्वक धर्म परिवर्तन की रोकथाम, कमजोर वर्गों की सुरक्षा तथा सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए बताई जाती है।
- संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म के पालन, आचरण और प्रचार का अधिकार देता है, जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।
- Rev. Stanislaus v. State of Madhya Pradesh में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धर्म प्रचार का अधिकार, जबरन धर्म परिवर्तन का अधिकार नहीं है।
- भारत में कोई राष्ट्रीय स्तर का धर्मांतरण विरोधी कानून नहीं है; परंतु उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में ऐसे कानून लागू हैं।
- इन कानूनों से जुड़े प्रमुख मुद्दों में अस्पष्ट शब्दावली जैसे “प्रलोभन” और “अनुचित प्रभाव” का दुरुपयोग शामिल है।
- आलोचकों के अनुसार पूर्व अनुमति की शर्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन हो सकती है, जिसे K.S. Puttaswamy v. Union of India में मान्यता दी गई।
- विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में इन कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।





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