ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड द्वारा सोलह अगस्त 1932 को घोषित सांप्रदायिक पुरस्कार ने भारत में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व हेतु पृथक निर्वाचिका और आरक्षित सीटों की नई व्यवस्था स्थापित की।
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सांप्रदायिक पुरस्कार गोलमेज सम्मेलन की पृष्ठभूमि में घोषित किया गया, जो विभिन्न सांप्रदायिक हितों के बीच मतभेदों को सुलझाने का ब्रिटिश सरकार का एकपक्षीय प्रयास था।
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भारतीय मताधिकार समिति की सिफारिशों के आधार पर अवर वर्गों के लिए अठहत्तर आरक्षित सीटें तथा पृथक निर्वाचिका की व्यवस्था प्रदान की गई।
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पृथक एवं संयुक्त निर्वाचिका का विवाद 1906 के शिमला प्रतिनिधिमंडल से प्रारंभ हुआ और 1909 के सुधार अधिनियम के माध्यम से औपचारिक रूप से स्थापित हुआ।
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दूसरे गोलमेज सम्मेलन में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अवर वर्गों को स्वतंत्र अल्पसंख्यक मानकर पृथक निर्वाचिका की मांग की, जिसका महात्मा गांधी ने विरोध किया।
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पुरस्कार के अंतर्गत मुसलमानों, सिखों, यूरोपीय, ईसाई, एंग्लो-भारतीय, महिलाओं तथा अवर वर्गों के लिए पृथक निर्वाचिका तथा सांप्रदायिक आधार पर सीट वितरण निर्धारित किया गया।
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अवर वर्गों को दोहरा मताधिकार प्रदान किया गया, जिससे वे पृथक निर्वाचिका और सामान्य निर्वाचन दोनों में मत देने के पात्र बने।
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महात्मा गांधी ने इसे राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध कदम बताया, जबकि डॉ. आंबेडकर ने इसे सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय माना।
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समग्र रूप से सांप्रदायिक पुरस्कार ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित किया और स्वतंत्रता आंदोलन में वैचारिक मतभेदों को तीव्र किया।





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