भारतीय संघवाद केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के संवैधानिक विभाजन पर आधारित है, जिसमें संघीय और एकात्मक दोनों विशेषताएँ शामिल हैं।
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संविधान भारत को राज्यों का संघ बताता है, जिससे एक मजबूत केंद्र वाला संघीय ढांचा स्थापित होता है।
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भाषाई, सांस्कृतिक और आर्थिक आधार पर क्षेत्रवाद कभी-कभी विशेष दर्जे या अलग राज्य की मांग को जन्म देता है।
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संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों के माध्यम से शक्तियों का विभाजन कई बार अधिकार क्षेत्र संबंधी विवाद उत्पन्न करता है।
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वित्तीय संघवाद राजस्व असंतुलन और केंद्र पर राज्यों की निर्भरता के कारण लगातार विवाद का विषय बना रहता है।
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संविधान संशोधन प्रक्रिया में संसद की प्रमुख भूमिका राज्यों की भागीदारी को सीमित करती है।
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अविनाशी संघ और विनाशी राज्यों की अवधारणा संसद को राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन का अधिकार देती है।
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राज्यपाल के पद पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप संघ-राज्य संबंधों में तनाव पैदा करते हैं।
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आपातकालीन प्रावधान केंद्र को व्यापक अधिकार देते हैं, जिससे संघीय ढांचा अस्थायी रूप से एकात्मक स्वरूप ले लेता है।





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