19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों को समाप्त कर भारतीय समाज का आधुनिकीकरण करना था।
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सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज में सुधार के लिए प्रारंभ हुए।
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ब्रिटिश शासन ने सती, बाल विवाह, भ्रूण हत्या और जाति प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों को उजागर किया।
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पाश्चात्य शिक्षा, आधुनिक विज्ञान, तर्कवाद और मानवतावाद से बौद्धिक जागरण हुआ।
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प्रेस की स्वतंत्रता और विधायी सुधारों ने सामाजिक कुरीतियों पर चर्चा को बढ़ावा दिया।
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सुधारकों ने धार्मिक सुधार को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना।
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राजा राममोहन राय, हेनरी डेरोज़ियो और दादोबा पांडुरंग जैसे नेताओं ने ब्रह्म समाज, यंग बंगाल आंदोलन और परमहंस मंडली का नेतृत्व किया।
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ये आंदोलन औपनिवेशिक भारत के उभरते मध्यम वर्ग की सामाजिक आकांक्षाओं को दर्शाते थे।
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सुधार आंदोलनों का उद्देश्य भारतीय परंपराओं और आधुनिक पश्चिमी विचारों का समन्वय था।





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