सिंह सभा आंदोलन औपनिवेशिक भारत में सिख धर्म, संस्थाओं और सामुदायिक पहचान के पुनरुद्धार हेतु प्रारंभ किया गया एक प्रमुख सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन था।
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सिंह सभा आंदोलन की शुरुआत 1873 में अमृतसर में सिख साम्राज्य के पतन के बाद सिख धार्मिक प्रथाओं और पहचान के संरक्षण के लिए की गई।
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इसका उद्देश्य गुरु ग्रंथ साहिब पर आधारित शुद्ध सिख आस्था को पुनर्जीवित करना और गुरुद्वारों से मूर्ति पूजा व ब्राह्मणवादी प्रथाओं को हटाना था।
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ईसाई मिशनरियों और अन्य धार्मिक सुधार आंदोलनों के दबाव में सिख समुदाय की पहचान को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था।
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आंदोलन के दौरान अमृतसर सिंह सभा और लाहौर सिंह सभा जैसे दो प्रमुख गुट उभरे, जिनमें वैचारिक मतभेद मौजूद थे।
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टट खालसा गुट ने सिख धर्म की अलग पहचान, पाँच ककार, समानता और मानकीकृत धार्मिक आचारों पर विशेष बल दिया।
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आंदोलन ने पंजाबी भाषा और गुरुमुखी लिपि को बढ़ावा देते हुए सिख विद्यालयों और कॉलेजों की स्थापना को प्रोत्साहित किया।
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सिंह सभा सुधारों ने भ्रष्ट महंत प्रथा का विरोध किया और गुरुद्वारों के प्रबंधन में सामुदायिक जवाबदेही की नींव रखी।
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इस आंदोलन से प्रेरित होकर आगे चलकर अकाली आंदोलन और एसजीपीसी जैसी सिख स्वशासी संस्थाओं का गठन हुआ।





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