19वीं सदी में बॉम्बे में शुरू हुआ पारसी सुधार आंदोलन ज़रथोस्त्री धार्मिक प्रथाओं को तर्क, शिक्षा और सामाजिक सुधार के माध्यम से आधुनिक बनाने का प्रयास था।
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पारसी सुधार आंदोलन 19वीं सदी के मध्य बॉम्बे में पश्चिमी शिक्षा, ईसाई मिशनरियों के प्रभाव और आंतरिक सामाजिक चेतना के परिणामस्वरूप उभरा।
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फैम-ए-फमशिद जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से नौरोजी फुरदोंजी ने ज़रथोस्त्री धर्म की रक्षा करते हुए तर्कसंगत व्याख्या को बढ़ावा दिया।
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जगत मित्र, जगत प्रेमी और रस्त गोफ्तार जैसी पत्रिकाओं ने सामाजिक सुधार, महिला शिक्षा और धार्मिक विवेकशीलता के विचारों का प्रसार किया।
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रहनुमाई मज़दयासन सभा की स्थापना 1851 में के.एन. कामा के सहयोग से हुई, जिसने पारसी सुधारों को संगठित रूप प्रदान किया।
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सभा ने कट्टर रूढ़िवाद, ज्योतिष, पुरोहितवादी प्रभुत्व और अत्यधिक कर्मकांडों का विरोध करते हुए तर्कसंगत धर्म का समर्थन किया।
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महिला शिक्षा को केंद्रीय मुद्दा बनाकर पारसी समाज में महिलाओं की साक्षरता और सामाजिक भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि की गई।
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विवाह सुधारों में बाल विवाह और खर्चीले संस्कारों का विरोध करते हुए सहमति-आधारित और विवेकपूर्ण वैवाहिक प्रथाओं को बढ़ावा दिया गया।





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