भारतीय काउंसिल अधिनियम 1892 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून है। इसका मकसद विधान परिषदों में भारतीयों की संख्या बढ़ाना था। यह कदम 1857 के बाद बढ़ते राजनीतिक दबाव और कांग्रेस की माँगों के संदर्भ में आया।
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• 1892 में पारित; विधान परिषदों में भारतीय भागीदारी बढ़ाने का प्रयास।
• पृष्ठभूमि: 1857 के बाद राष्ट्रीय चेतना और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की माँगें।
• वैसराय (गवर्नर-जनरल) की परिषद का आकार अब 10–16 सदस्य तय।
• कम-से-कम आधे सदस्य गैर-आधिकारिक यानी सरकारी नहीं होने चाहिए।
• नामांकन का अधिकार गवर्नर-जनरल के पास ही रहा; भारतीय निकायों को केवल नाम सुझाने का हक।
• अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व: नगरपालिका, विश्वविद्यालय, चैंबर आदि सदस्य सुझा सकते थे।
• सदस्यों को वार्षिक लेखा-जोखा पर चर्चा और प्रश्न पूछने की छूट मिली।
• वे बजट पर मतदान कर सकते थे, पर वित्तीय प्रावधानों में संशोधन नहीं कर सकते थे।
• प्रावधान पंजाब और बर्मा जैसे कुछ प्रांतों तक विस्तारित।
• महत्त्व: विधान में भारतीय आवाज़ को सीमित कानूनी मान्यता मिली।
• कमियाँ: वास्तविक चुनाव नहीं, सीमित अधिकार, तंग मताधिकार और कार्यपालिका का प्रभुत्व बना रहा।
• निष्कर्ष: यह एक सशंकित औपचारिक रियायत थी; राष्ट्रीय उम्मीदें शांत न हुईं।





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