भारत में “दुर्लभतम में दुर्लभ” मामलों में मृत्युदंड जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने अब दया याचिकाओं पर प्रक्रिया तेज़ और मानवीय बनाने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
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- भारत में मृत्युदंड अब भी वैध है, IPC और अन्य कानूनों के तहत।
- सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में तय किया – सिर्फ “rarest of rare” मामलों में फांसी।
- IPC 302, 376A जैसी धाराओं में गंभीर अपराधों पर फांसी का प्रावधान।
- 1947 से अब तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार केवल 60 फांसी दी गईं।
- नागरिक संगठनों के अनुसार कुल संख्या 3,000–4,000 तक हो सकती है।
- सुप्रीम कोर्ट अपील के बाद राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास दया याचिका जाती है।
- फैसला राष्ट्रपति नहीं, गृह मंत्रालय की सिफारिश पर लिया जाता है।
- दया याचिका पर निर्णय के लिए कोई निश्चित समयसीमा नहीं।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा – लंबी देरी पर सज़ा को उम्रकैद में बदला जा सकता है।
- फांसी से पहले कम से कम 14 दिन की नोटिस अवधि जरूरी।
- सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को दया याचिकाओं के लिए विशेष सेल बनाने का निर्देश दिया।
- प्रक्रिया ईमेल और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से तेज़ करने को कहा गया।
- हर राज्य के गृह विभाग में एक न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति आवश्यक।
- सत्र न्यायालयों को सभी लंबित मृत्युदंड मामलों का रिकॉर्ड रखना होगा।





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