भक्ति आंदोलन 7वीं से 17वीं सदी के बीच भारत में उभरा और धार्मिक व सांस्कृतिक जीवन को बदला। यह जातिवाद, कर्मकांड और जटिल दर्शन के विरोध में जन्मा। सभी वर्गों के संतों ने प्रेम, समानता और सरल भक्ति का प्रचार किया। आंदोलन ने समाज सुधार, स्थानीय साहित्य और आध्यात्मिक समानता को बढ़ावा दिया।
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- 7वीं सदी में दक्षिण भारत में शुरुआत, 17वीं सदी तक पूरे भारत में फैला
- जाति भेद, जटिल कर्मकांड और धर्म के अभिजात्य वर्चस्व के खिलाफ प्रतिक्रिया
- भक्ति को प्रधानता दी, भगवान से व्यक्तिगत जुड़ाव को महत्व मिला
- कबीर, मीराबाई और गुरु नानक जैसे संतों ने जाति व मूर्ति पूजा का विरोध किया
- दो प्रमुख विचारधाराएँ: निर्गुण (निराकार ईश्वर), सगुण (साकार ईश्वर)
- मीराबाई, अंडाल और जनाबाई जैसी महिला संतों ने लिंग असमानता को चुनौती दी
- भजन और कविताएँ स्थानीय भाषाओं में, जिससे आम लोग जुड़ सके
- सिख धर्म की नींव में भूमिका, हिन्दू पूजा परंपरा को बदला
- सती, कन्या भ्रूण हत्या और ब्राह्मण वर्चस्व का विरोध
- हिन्दू-मुस्लिम सामंजस्य बढ़ाया, साझा आध्यात्मिकता को बल मिला





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