भारतीय वैज्ञानिकों के नए अध्ययन के अनुसार तेज हिमालयी अपरदन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन बढ़ा सकता है और वैश्विक जलवायु पर प्रभाव डाल सकता है।
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- पुणे स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, वाडिया संस्थान और रुड़की भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने हिमालयी अपरदन का अध्ययन किया।
- अध्ययन के अनुसार तेजी से अपक्षयित हिमालयी खनिजों से कार्बन डाइऑक्साइड का निर्माण, सिलिकेट अपक्षय द्वारा अवशोषण की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है।
- भारतीय भूभाग का यूरेशियाई भूभाग की ओर लगातार बढ़ना हिमालयी पर्वतों में तीव्र अपरदन को बढ़ाता है और नई सिलिकेट खनिज सतहें उजागर करता है।
- उजागर हुए नए खनिज वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करते हैं और प्राकृतिक कार्बन चक्र को प्रभावित करते हैं।
- अपक्षय से बने खनिज पदार्थ नदियों के माध्यम से समुद्रों तक पहुंच सकते हैं, जहां कार्बन अंततः समुद्री तलछट में सुरक्षित हो सकता है।
- अध्ययन बताता है कि हिमालयी अपरदन पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था में कार्बन डाइऑक्साइड के एक महत्वपूर्ण और कम आंके गए स्रोत का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
- बढ़ते तापमान से हिमनदों की अस्थिरता और अपरदन में बदलाव होने पर हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक कार्बन विनिमय भी प्रभावित हो सकता है।
- अध्ययन पर्वतीय क्षेत्रों में भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं, खनिज अपक्षय और वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड के बीच जटिल संबंधों को स्पष्ट करता है।
- निष्कर्ष इस धारणा को चुनौती देते हैं कि तेजी से अपरदित पर्वतीय क्षेत्रों में सिलिकेट अपक्षय हमेशा कार्बन डाइऑक्साइड की प्रभावी कमी करता है।
- हिमालयी भूवैज्ञानिक गतिविधियों पर जलवायु अनुसंधान में अधिक ध्यान आवश्यक है, क्योंकि अपरदन कार्बन उत्सर्जन और दीर्घकालिक भंडारण दोनों प्रभावित कर सकता है।
- अध्ययन पर्वत निर्माण की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को वर्तमान जलवायु परिवर्तन से जोड़ता है और वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड पर उनके प्रभाव को रेखांकित करता है।
- इन प्रक्रियाओं की बेहतर समझ से जलवायु आकलन में तेज अपरदन और खनिज ऑक्सीकरण से जुड़े छिपे कार्बन स्रोतों को शामिल किया जा सकेगा।





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