Basic Structure Doctrine भारतीय संविधान का एक महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत है, जिसके अनुसार संसद संविधान के मूल ढांचे को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती।
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- बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन 1973 के केशवानंद भारती मामले में स्थापित हुआ।
- इस सिद्धांत के अनुसार संसद Article 368 के तहत संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदल सकती।
- यह सिद्धांत संविधान के मूल सिद्धांतों की रक्षा करता है।
- संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन और न्यायिक समीक्षा इसके प्रमुख तत्व हैं।
- संघवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और शक्तियों का विभाजन भी इसका हिस्सा हैं।
- यह संसद की शक्तियों और संवैधानिक सीमाओं के बीच संतुलन बनाए रखता है।
- स्वतंत्रता के बाद लगातार संशोधनों के कारण इस सिद्धांत की आवश्यकता महसूस हुई।
- शंकर प्रसाद और सज्जन सिंह मामलों में संसद की संशोधन शक्ति को मान्यता दी गई थी।
- 1967 के गोलकनाथ मामले में संसद को मौलिक अधिकार बदलने से रोका गया।
- 24वें संविधान संशोधन ने संसद की संशोधन शक्ति पुनः बहाल की।
- केशवानंद भारती फैसले ने संशोधन की अनुमति दी लेकिन मूल ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित की।
- इंदिरा गांधी मामले में न्यायिक समीक्षा को मूल संरचना का हिस्सा माना गया।
- मिनर्वा मिल्स मामले में संसद की असीमित संशोधन शक्ति को असंवैधानिक बताया गया।
- एस.आर. बोम्मई मामले में संघवाद और धर्मनिरपेक्षता को मूल संरचना माना गया।
- IR Coelho मामले में नौवीं अनुसूची के कानूनों की न्यायिक समीक्षा को अनुमति मिली।
- यह सिद्धांत लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक स्थिरता की रक्षा करता है।
- आलोचकों के अनुसार इससे न्यायिक सक्रियता बढ़ती है और संसद की शक्ति सीमित होती है।
- फिर भी यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा में से एक माना जाता है।





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