भारत में न्यायिक लंबित मामलों का संकट गहराता जा रहा है। 2025 तक लगभग 4.9 करोड़ मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। न्यायाधीशों की कमी, पुराने कानून और कमजोर बुनियादी ढाँचा इस संकट को और गहरा बना रहे हैं।
- देशभर में 4.9 करोड़ से अधिक मामले लंबित (राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड 2025 के अनुसार)।
- सुप्रीम कोर्ट: 88,000+ मामले; हाई कोर्ट: 60 लाख+; जिला न्यायालय: 4.2 करोड़+।
- अधिकारों की बढ़ती जागरूकता (RTI, RTE, PIL) से न्यायालयों में मामले बढ़े।
- देश में केवल 21,000 न्यायाधीश, जनसंख्या अनुपात — 10 प्रति 10 लाख, जबकि मानक 50 होना चाहिए।
- नियुक्ति विवादों में केंद्र और राज्य की खींचतान से पद खाली।
- न्यायपालिका के लिए कुल बजट का केवल 0.1–0.4% आवंटन।
- सरकार सबसे बड़ी वादी (litigant) — आधे से ज़्यादा मामले सरकारी।
- निचली अदालतों की गुणवत्ता कमजोर, अपीलों की संख्या बढ़ती जा रही है।
- पुराने और अस्पष्ट कानून मुकदमों को वर्षों तक खींचते हैं।
- समाधान: न्यायाधीशों की संख्या 50,000 तक बढ़ाना, All India Judicial Service बनाना, Fast Track Courts, लोक अदालतें और ग्राम न्यायालय बढ़ाना।





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