स्वदेशी आंदोलन 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में एक बड़े जनआंदोलन के रूप में शुरू हुआ। इसने आत्मनिर्भरता, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और भारतीय उद्योगों के पुनर्जीवन को बढ़ावा दिया। आंदोलन ने छात्रों, महिलाओं और आम जनता को जोड़ा और भविष्य के स्वतंत्रता संघर्ष के लिए आधार तैयार किया, हालांकि ब्रिटिश दमन का सामना करना पड़ा।
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- 1905 में लॉर्ड कर्ज़न के बंगाल विभाजन के खिलाफ शुरू हुआ
- 1911 तक चला; गांधी-पूर्व सबसे सफल जनआंदोलन
- आत्मनिर्भरता, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहन
- प्रमुख नेता: सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, तिलक, लाला लाजपत राय, आनंद मोहन बोस
- छात्रों व महिलाओं की सक्रिय भागीदारी; पहली बार महिलाओं ने सार्वजनिक विरोध किया
- स्वदेशी स्कूल, साबुन, कपड़ा, रसायन जैसे उद्योग स्थापित हुए
- बंगाल से बाहर बंबई, पूना, पंजाब, दिल्ली, मद्रास तक फैला
- ब्रिटिश दमन: गिरफ्तारियां, लाठीचार्ज, वंदे मातरम् पर प्रतिबंध
- कांग्रेस में फूट (सूरत विभाजन) से आंदोलन कमजोर पड़ा
- महात्मा गांधी के नेतृत्व में बाद में अपनाई गई निष्क्रिय प्रतिरोध की नींव रखी





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