सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी मामले में पक्षकार न होने के बावजूद यदि कोई व्यक्ति या अधिकारी अदालत के आदेश की अवहेलना में जानबूझकर सहयोग करता है, तो उसे अवमानना का दोषी ठहराया जा सकता है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने छत्तीसगढ़ सरकार से जुड़े अवमानना याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की।
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- सुप्रीम कोर्ट ने कहा, गैर-पक्षकार भी अवमानना के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
- जानबूझकर आदेश उल्लंघन में सहयोग करना अवमानना माना जाएगा।
- न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ का फैसला।
- अवमानना अधिकारिता केवल मूल पक्षकारों तक सीमित नहीं।
- आदेश की जानकारी होने के बाद निष्क्रिय रहना भी दोषपूर्ण आचरण।
- जिम्मेदारी पार्टी स्टेटस से नहीं, बल्कि व्यवहार से तय होगी।
- कोर्ट ने सीता राम बनाम बलबीर (2017) फैसले का हवाला दिया।
- आदेश लागू करने वाली श्रृंखला में शामिल अधिकारी जवाबदेह।
- “हम पक्षकार नहीं थे” तर्क देकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
- प्रशासनिक कठिनाई को अवमानना में वैध बचाव नहीं माना जाएगा।
- आदेश गलत लगे तो संशोधन या अपील का रास्ता अपनाना होगा।
- अवमानना कार्यवाही में केवल अनुपालन की जांच होती है।
- मामला 20 मई 2025 के आदेश के अनुपालन से जुड़ा था।
- निर्धारित समय में गोडाउन कीपर का पद सृजित नहीं किया गया।
- कोर्ट ने प्रथमदृष्टया अवमानना मामला माना, अंतिम अवसर प्रदान किया।





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