विशेष श्रेणी का दर्जा राज्यों को उनकी भौगोलिक और आर्थिक कठिनाइयों के आधार पर विशेष केंद्रीय सहायता प्रदान करने की एक प्रशासनिक व्यवस्था है।
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विशेष श्रेणी का दर्जा सामाजिक आर्थिक और भौगोलिक पिछड़ेपन वाले राज्यों को संतुलित विकास के लिए विशेष केंद्रीय सहायता प्रदान करने की व्यवस्था है।
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यह अवधारणा 1969 में पांचवें वित्त आयोग की सिफारिशों पर महावीर त्यागी की अध्यक्षता में शुरू की गई थी।
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संविधान में विशेष श्रेणी दर्जे का कोई प्रावधान नहीं है और इसे राष्ट्रीय विकास परिषद तथा केंद्र सरकार द्वारा प्रशासकीय रूप से दिया जाता है।
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मानदंडों में पर्वतीय भूभाग सीमावर्ती स्थिति कम प्रति व्यक्ति आय विरल जनसंख्या जनजातीय बहुलता और आर्थिक पिछड़ापन शामिल हैं।
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वर्तमान में पूर्वोत्तर राज्यों एवं हिमालयी क्षेत्रों सहित ग्यारह राज्यों को विशेष श्रेणी का दर्जा प्राप्त हुआ है।
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लाभों में उच्च अनुदान अनुपात कर छूट ऋण राहत केंद्रीय योजनाओं में प्राथमिकता और अप्रयुक्त धनराशि आगे ले जाने की सुविधा शामिल है।
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नई मांगों से लाभों के क्षीण होने और सीमित आर्थिक प्रभाव को लेकर विशेष श्रेणी दर्जे पर चिंताएँ सामने आईं।
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चौदहवें वित्त आयोग ने 2015 से विशेष श्रेणी व्यवस्था हटाकर राज्यों के कर हिस्से को बढ़ाकर 42 प्रतिशत कर दिया।





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