पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना 1870 में हुई, जिसने ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय हितों का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रारंभिक राजनीतिक जागरूकता को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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- पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना 2 अप्रैल 1870 को पुणे में हुई, जिसका उद्देश्य भारतीय हितों का प्रतिनिधित्व करना और जनता तथा औपनिवेशिक शासन के बीच सेतु बनना था।
- इस संस्था का नेतृत्व महादेव गोविंद रानाडे ने किया, उनके साथ गणेश वासुदेव जोशी, एस एच साठे और एस एच चिपलूनकर जैसे प्रमुख सहयोगी जुड़े थे।
- यह संस्था लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर कार्य करती थी, जिसमें निर्वाचित सदस्य होते थे और विभिन्न सामाजिक वर्गों जैसे पेशेवर, भूमिधारक तथा शिक्षित मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया।
- सभा ने जन समस्याओं को प्रभावी रूप से उठाया और याचिकाओं के माध्यम से शासन तक पहुंचाकर नागरिक अधिकारों और प्रशासनिक सुधारों को बढ़ावा दिया।
- इस संस्था ने किसानों के हितों का समर्थन किया और वन, नमक तथा प्रेस से जुड़े अन्यायपूर्ण कानूनों का विरोध करते हुए ग्रामीण हितों की रक्षा के लिए कार्य किया।
- सभा ने बैठकों, व्याख्यानों और अपनी पत्रिका के माध्यम से लोगों में राजनीतिक जागरूकता, शिक्षा, एकता और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया।
- इसने अकाल राहत कार्यों का आयोजन किया तथा नागरिक विवादों के समाधान के लिए न्याय सभाओं की स्थापना कर समाज को महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की।
- पूना सार्वजनिक सभा ने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन को प्रेरित किया।





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